रविवार, 28 मई 2017

और ज़माना धूप ही धूप

दुनिया की सारी माँओं के लिये 

माँ  ये क्या बात है कि 
सुख में तुम मुझे याद आओ या न आओ 
दुख में तुम हमेशा मेरे सिरहाने खड़ी होती हो 
जब मैं नन्हीं बच्ची थी 
मैंने पहचाना पहला स्पर्श तुम्हारा ही 
मेरे आने से पहले ही तुमने ,
सजा लिया था मुझसे अपना सँसार 
फूलों सा तुमने पाला मुझको 
बिन माली गुलशन का रूप है क्या 
ज़िन्दगी ने लिये कितने ही इम्तिहाँ 
हर ठोकर पर निकला मुहँ से ' हाय माँ '
माँ तुम ठण्डी छाया हो 
और ज़माना धूप ही धूप 
ये जीवन है माँ की बदौलत 
माँ की महिमा ऐसी अनूप 

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

श्रद्धाँजलि

राकेश गुप्ता जी के निधन पर श्रद्धाँजलि  

आज रोया है आसमाँ भी 
हाय खो दिया है हमने एक नम सीना 
तुमने जिया था ज़िन्दगी को एक शायर की तरह 
दर्द की इन्तिहाँ को जानता है एक शायर ही 

तुम चलते हुए कभी थके ही न थे 
वक़्त ने जकड़ा तो जंजीरों की तरह 
मौत की आदत है, ये बहाना माँगे 
तुमने पी लिये थे घूँट इसके , जीते-जी ही 
पिया इतना दर्द और किसी से बाँटा भी नहीं 

तुम्हारी साथी कलाइयों ने ,घबराहट में छू ली होंगी कितनी ही गर्म पतीलियाँ 
हाथ से छूटे होंगे सालन भी कई 
सारी जद्दो-जहद किसी काम न आई 
तुम आज़ाद हुए देह के पिंजरे से 
तुम्हारे बिना रीती दुनिया ,झाँक रही है किसी की आँखों से 
फेरों की वेदी से लेकर चिता की अग्नि की लपटों तक का सफर ,
घूम गया होगा किसी की आँखों के आगे से 

अब अतीत की यादें हैं , डूबें के किनारों पर ले आयें 
तुम सो जाओ कि तुम्हें ज़न्नत नसीब हो 
तुमने कभी किसी को दुख न दिया ,
तुम्हें सुख नसीब हो 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

कुछ यादगार लम्हे ,

थोड़े लम्हे चुरा लें 
थोड़ी बात बना लें 
जीवन की आपा-धापी से 
फुर्सत का कोई सामान जुटा लें 

पेड़ों के झुरमुट से झाँकता हुआ ,
तारों भरा आसमाँ 
मद्धिम सी रौशनी में ,समुद्र  किनारे चंचल सी लहरों की अठखेलियाँ 
तुम ही तो लाये हो ये मुकाम 

यूँ ही चलते-चलते  लिखा है दिल ने कुछ तुम्हारे नाम 
उँगली पकड़ो साथ चलो तुम , भूलो न सुबह का पैगाम 
जमीन होती है तो आसमान होता है , खिले होते हैं रँग भी तमाम 

अपनी अँखियों से बाँट रहे हो उजियारा 
खिल उठे हैं फूल ही फूल तमाम 
कुछ यादगार लम्हे , राहत का सामान जुटा लें